Wednesday, November 4, 2015

Nitish Kumar's speech on Quota in Lok Sabha in 2005, NaMo (Narendra Modi) quoted during election in Bihar

Lok Sabha Debates
Regarding Supreme Court'S Observation On State Quota And ... on 24 August, 2005
> Title :Regarding Supreme Court's observation on State quota and reservation policy in unaided private professional colleges.
   
MR. SPEAKER: Before we come to the Calling Attention, there is a concern from almost all sections of the House about certain observations that have come from the highest Court of this country, which seem to concern almost all Party Leaders.  I have decided to give brief opportunity to all the Party Leaders here to make submissions.  I would request all of you, considering the sensitivity of the matter you should be speaking in a manner which does credit to both, us and to the great institution, namely, the judiciary.
श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण-मध्य): सर, मैंने प्रीवलेज दिया हुआ है।
अध्यक्ष महोदय :  आप बैठ जाइये। इस बारे में अपने लीडर से पूछिय्ो[r20] ।Shri Rawale, it is also necessary that you should listen to the Chair; otherwise, you are committing breach of privilege yourself[R21] .
            Now,  Prof. Vijay Kumar Malhotra.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा अध्यक्ष महोदय, सुप्रीम कोर्ट ने कल कुछ ऐसे आब्जर्वेशन किए और आब्जर्वेशन के कारण अलग-अलग उसकी कई प्रतक्रियाएं आयीं। मैं पहले स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि इस सदन ने सर्वसम्मति से इस बात का विचार किया था और सभी नेताओं की बैठक हुई, उसमें भी इस बात पर विचार हुआ कि सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए और सामाजिक नयाय की द्ृष्टि से कानून में इतना परिवर्तन किया जाए, ताकि जो प्राइवेट इंस्टीटयूशंस हैं, उनमें रिजर्वेशन रह सके और इस द्ृष्टि से एक सर्वसम्मत राय इसके बारे में बनी है। इस संबंध में हमने नया कानून बनाने के लिए कमेटी का गठन करने का भी विचार किया है और वह कमेटी गठित करके उसके बारे में अपना निर्णय देगी ओर उसके मुताबिक कानून बनेगा। जहां तक सुप्रीम कोर्ट का संबंध है या जुडीशियरी का संबंध है, पार्लियामेंट का संबंध है, मैं कहना चाहता हूं कि प्रेसीडेंट, पार्लियामेंट और सुप्रीमकोर्ट ये तीनों अपने-अपने दायरों में सर्वोच्च हैं, परंतु जो सबसे सर्वोच्च हैं, वह है कांस्टीटयूशन। संविधान के बेसिक फीचर को छोड़कर उसमें अमेंड करने का अधिकार हमारा जरूर है, इसलिए हम यह जरूर विचार रखेंगे कि यहां कांस्टीटयूशन के मुताबिक जो भी काम हो, उसमें सभी तीनों पक्ष को इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। हम नहीं चाहते हैं कि कोई ऐसा कंफ्रंटेशन सुप्रीम कोर्ट, जुडीशियली एक्जेक्टिव या पार्लियामेंट में इन सब के अंदर, लेजिस्लेचर में कोई कंफ्रंटेशन होने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
अध्यक्ष महोदय, इसके साथ ही मैं यह जरूर कहना चाहता हूं कि हम यहां पार्लियामेंट में अपने अधिकारों को सुरक्षित रखना चाहते हैं और रहने भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही है कि नया कानून बनाइए और ठीक कानून बनाइए और उस कानून के मुताबिक काम हो। इस चीज में मुझे कोई आपत्ति दिखाई नहीं देती है, परंतु कई बातें पीछे हुईं। हम इस बात को स्पष्ट करना चाहते हैं कि मजहब के आधार पर कोई आरक्षण, सबसे पहले यह शुरू हुआ है इस बात से …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :   आप बैठ जाइए, ...( व्यवधान)
श्री इलियास आज़मी धर्म के आधार पर …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :   सब का हक है, आप भी बोलिएगा। आप अभी बैठ जाइए। हम लोगों को थोड़ा सुनना भी चाहिए।
...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय :   थोड़ा सहन करना भी जानना चाहिए।
...( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Shri Azmi, nothing is being recorded.
(Interruptions) … * प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : अध्यक्ष महोदय, जो बात संविधान के विरोध में जाती है। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :   आजमी जी, कृपया बैठ जाइए।
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : अगर कोई कानून ऐसा बना दिया जाएगा, जो संविधान के भी खिलाफ हो, तो स्वाभाविक रूप से कोट्र्स को उसके बीच में आने का अधिकार रहता है। सामाजिक न्याय, सामाजिक समरसता, उनका आरक्षण हम जरूर चाहते हैं, उसके लिए यहां कानून बनाया जाएगा। हम उसका पूरा समर्थन करेंगे, परंतु यह मामला शुरू हुआ, फिर आईएमडीटी एक्ट आया।…( व्यवधान) 
* Not Recorded   अध्यक्ष महोदय :   कृपया आप बैठ जाइए।
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : बिहार के अंदर बिल्कुल ऐसी बात कर दी गई कि विधानसभा बनी ही नहीं, उसके पहले भंग कर दी, उसके बाद कई ऐसे मामले सामने आए। झारखंड का मामला सामने आया, बिहार का आया, गोवा का आया।महोदय, मैं सिर्फ यही बात कहना चाहता हूं कि …( व्यवधान)   हमारा संविधान सर्वोच्च है। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  आप बैठ जाइए। Let me regulate the House मल्होत्रा जी, मैं आपसे रिक्वेस्ट करता हूं to speak on this subject.  Otherwise, it will become difficult.
...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय :   क्या बात है, मैं खड़ा हुआ हूं, आपको बैठना चाहिए। You will have to sit down Shri Azmi.  आप उनकी बात मानते नहीं हैं।
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : अध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। मैं तो केवल इतना कहना चाहता था कि हम बिना सुप्रीम कोर्ट में, पार्लियामेंट में या इसमें आपस में कंफ्रंटेशन करने का सवाल नहीं है MR. SPEAKER: I made an appeal to you.  This is a very sensitive matter.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: On the last occasion, the entire House made certain observations, showing their concerns about a particular issue on which some observations appear to have been made by another very respected institution of this country, namely, the judiciary[R22] .
 आप बैठ जाइए, इसके लिए हमारी रिक्वेस्ट है।
...( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Therefore, I am requesting you to please concentrate on this issue. Please refer to that matter only.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : मैं समझता हूं और मैंने देखा है दलित क्रिश्चियन्स के आरक्षण वाली बात पर यह मामला उठा था कि दलित क्रिश्चियन्स का आरक्षण होना चाहिए और उन्हें एससी की पावर मिलनी चाहिए। अगर कोई संविधान के खिलाफ जाता है तो उनको कहने का अधिकार है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट या पार्लियामेंट के जो अधिकार हैं, केवल इस बात के लिए हम अपने अधिकार सुरक्षित रखें और सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकार सुरक्षित रखे। कोई सीमा से बाहर न जाए और किसी तरह से कन्फ्रन्टेशन न हो। परंतु वे कहते हैं कि बिल बनाओ, हम बिल जरूर बनाएंगे और हम उसका पूरा समर्थन करेंगे जिसमें सामाजिक न्याय और समरसता होगी।
MR. SPEAKER: Now, Shri Basu Deb Acharia to speak.  Please restrict yourself only to that and please do not go beyond this. I made an appeal that you should be cautious in making your submission.
SHRI BASU DEB ACHARIA Sir, we have seen that there was unanimity in this House when the Supreme Court gave verdict against the reservation being provided in the private educational and professional institutions. The whole House was unanimous and we all demanded that the Government should bring a legislation and that if the amendment of the Constitution is necessary, that can also be done.
            Yesterday, as desired by the Leaders of this House, the Minister of Human Resource Development, Shri Arjun Singh, convened a meeting of Leaders of all the political parties.
SHRI BRAJA KISHORE TRIPATHY (PURI): He had not invited all the Leaders.  We have not been consulted.
MR. SPEAKER: This is not the main point.  The point is that there were efforts to bring a new Bill. 
SHRI BRAJA KISHORE TRIPATHY :  I wanted to make it clear.
MR. SPEAKER: Certainly, you have made your point.
SHRI BASU DEB ACHARIA : In that meeting also, a unanimous opinion emerged that the Government should bring a legislation and amend the Constitution to provide reservation for the backward sections of our country and also the dalits of our country.
MR. SPEAKER: We are not going into the merits of the matter.
SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, it is unfortunate that when this House expressed a unanimous opinion, yesterday the Supreme Court of India made an observation that if the Government of India goes against their advice, then there is no necessity for having any court.  The Government can do anything they like.  This is most unfortunate.  The Judiciary, the Executive and the Legislature all have their own functions.
            Sir, we all congratulated you when that situation arose… (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय :  आप इसे छोड़िए। हमने छोड़ने के लिए बोला है।
...( व्यवधान)
PROF. VIJAY KUMAR MALHOTRA : It should not be raised again.
MR. SPEAKER: Please do not raise that.  Of course, I was right and I am still right.  I would request everybody not to cross the Lakshman rekha that I have imposed.
SHRI BASU DEB ACHARIA : We do not want any confrontation.  Why should there be any confrontation?  The Legislature has its own powers to enact the legislation… (Interruptions)
MR. SPEAKER: You can say that let us all restrict ourselves to our respective jurisdiction.
SHRI BASU DEB ACHARIA : It is against the basic structure of the Constitution.  What we feel is there in the Constitution.  The reservation to the weaker sections of our country and to the dalits is there in the Constitution.  That is in the basic structure of the Constitution[r23] .

            The Parliament has the right and the authority to enact laws and the Judiciary has nothing to do about that. We have every respect for the Judiciary, but the observations made by the Supreme Court yesterday was unfortunate. What we want is that there should no confrontation and we should function within our respective domains. The Government should enact legislation to provide reservation to the weaker sections of the society.
प्रो. राम गोपाल यादव श्रीमान संसद और न्यायपालिका के बीच कंफ्रंटेशन का कोई सवाल नहीं है और न ही कल सर्वोच्च न्यायालय ने संसद के खिलाफ कोई टिप्पणी की है। मैं संसद सदस्यों से आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि १९३०, १९३१ और १९३२ में जब सारी दुनिया में मंदी आयी थी, तो उससे निपटने के लिए अमरीका ने कुछ कानून बनाए, जिनको डी-लॉज़ के नाम से जाना जाता है। अमरीकन सुप्रीम कोर्ट ने जब उसे रद्द कर दिया तो अमरीका के राष्ट्रपति श्री रूज़वेल्ट ने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय को अपने लोगों से भर लेंगे। आप जानते हैं कि अमरीका में सीनेट की अप्रूवल के बिना सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति किसी जज की नियुक्ति नहीं कर सकता है। सीनेट ने इस धमकी पर रत्तीभर भी गौर नहीं किया और कभी ऐसा मौका नहीं आया कि न्यायपालिका में कोई हस्तक्षेप हुआ हो।
जैसा आप जानते हैं कि जब पहला जमींदारी उन्मूलन विधेयक पटना हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था तब पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इसी हाउस में कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो The haves  will remain haves  and the have-nots , the have-nots , लेकिन ऐसी कोई बात नहीं हुई। कभी यह नहीं कहा गया कि टकराव हो। निर्णय और मत हमेशा अलग-अलग रहे हैं। सम्पत्ति के मौलिक अधिकार को ले कर आर्टिकल ३१ के तहत जितने भी मुकदमे चले, आप बहुत बड़े वकील हैं और कानून को जानने वाले बहुत से लोग यहां बैठे हुए हैं, इतनी मुकदमेबाजी कभी नहीं हुई है। चाहे गोलकनाथ का केस हो, चाहे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मामला हो, चाहे कम्पन्सेशन शब्द को आर्टिकल ३१ से हटाकर एमांउट में बदलने का मामला हो। उससे भी मामला नहीं सुलझा तो अंततोगत्वा आर्टिकल ३१ को मिटाना पड़ा। उसे जब चैलेंज किया गया तब फंडामेंटल राइट्स को ओवर राइट करने का अधिकार दिया गया कि डाइरेक्टिव प्रिंसीपल्स में Fundamental Rights are over-riding the  Directive Principles  in certain case . उसे भी चैलेंज किया गया तब जो फैसला हुआ उसमें जस्टिस एच.आर. खन्ना का यह फैसला था कि हम अपने संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को नहीं बदल सकते हैं। That still stands. हमारे संविधान की जो प्रस्तावना है उसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने की बात कही गई है। उसे ही हम बेसिक स्ट्रक्चर मानते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह नहीं कहा कि हम कानून नहीं बना सकते। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि आप कानून बनाइए। कानून बनाने का अधिकार हमारा है, लेकिन कानून की समीक्षा करने का अधिकार संविधान ने न्यायपालिका को दिया है। सर्वोच्च न्यायालय यह नहीं कह रहा है कि आप कानून मत बनाइए। आप जो चाहे कानून बनाइए। अगर कोई उस कानून को चुनौती देता है then the Supreme Court has got the Fundamental right to review it  जहां कोई यह समझता है कि यह हिस्सा गैर संविधानिक या पूरा सविधान से हटकर है तो उसे रद्द करने का अधिकार है। इसलिए कहीं भी यह लोगों में नहीं जाना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय और संसद में कोई विवाद है।
आप कानून बनाइए, आरक्षण की व्यवस्था कीजिए, यह हमारा बेसिक स्ट्रक्चर भी है। जो पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक हैं उन्हें आर्टिकल ३० के तहत जो संस्थान चल रहे हैं, उसमें किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। हम भी यह चाहते हैं कि यह कानून बनना चाहिए। न्यायपालिका कहीं भी इस पर बंदिश नहीं लगाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने थोड़ी सी डांट लगायी है, लेकिन संसद के लिए कुछ नहीं कहा है।
[rpm24]              वह कार्यपालिका के लिए कहा है। जब आज किसी मामले को सुना जाना है, तो एक दिन पहले उस पर कानून बनाने या आदेश देने की क्या जरूरत थी ? जब सर्वोच्च न्यायालय में कोई मामला चल रहा है, आज सुनवाई हो रही है, उसकी पूर्व संध्या पर गवर्नमेंट कोई कार्य करे, तो स्वाभाविक है कि गवर्नमेंट की आलोचना होगी। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आप पूरे देश को रिप्रजेंट करते हैं। You are the masters of the country. आप जैसा चाहें वैसा कानून बना सकते हैं। आप जैसा चाहें वैसा संविधान संशोधन कर सकते हैं। आप जैसा चाहें वैसा कानून ला सकते हैं। जो कानून न्यायपालिका ने रद्द कर दिया, उस कानून को आप जिन्दा कर सकते हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी के केस में क्या हुआ, जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा वाले केस में क्या हुआ, वह आप सबको मालूम है। वर्चुअली हाइकोर्ट ने जो आदेश दिया था, That judgement was virtually annulled by this Parliament.
MR. SPEAKER: Prof. Ram Gopal Yadav, we are concentrating on a simple issue.  Then, other hon. Members also will start saying many other things.
प्रो. राम गोपाल यादव : मेरा कहना है कि यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि संसद और न्यायपालिका के बीच किसी तरह का मतभेद है। संसद कानून लाए, इसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं है। इस बारे में कल बात हो गई थी, सर्वसम्मति बन गई थी, सहमति हो गई थी कि कानून आना चाहिए और किसी तरह के तनाव और टकराहट की बात नहीं होनी चाहिए। यह देश के स्वास्थ्य के हित में नहीं है। थैंक्यू सर।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव अध्यक्ष महोदय, आज सदन में बहुत से माननीय सदस्यों ने बहुत ही संवेदनशील विषय पर चर्चा की है। मैं समझता हूं कि सदन में नेताओं ने जो अपनी राय रखी, उसमें “टकराव” शब्द का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। मैं समझता हूं कि यह बहुत ही आपत्तिजनक है। हमारे यहां डैमोक्रेटिक फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट है और ऐसे समय में, इंडियन जुडीशियरी के इतिहास में, जितनी मेरी समझ है, राजनीति में जितने दिनों से मैं हूं, मेरे संसदीय जीवन में, असैम्बली से लेकर पार्लियामेंट तक, मैंने इस तरह के रिमार्क, इस तरह की आब्जर्वेशन, किसी न्यायालय द्वारा, न्यायपालिका के जरिये, न्यायमूर्ति के जरिये की गई हो, नहीं देखी। चीफ जस्टिस के जरिये, जो आब्जर्वेशन आई है, वह न केवल अभूतपूर्व है, न केवल अनप्रैसीडेंटेड है, बल्कि अनावश्यक भी है।
महोदय, अनावश्यक इसलिए है, क्योंकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। किस संदर्भ में इस प्रकार के आब्जर्वेशन की आवश्यकता हुई ? ठीक है, प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा जी द्वारा क्रिश्चियनों और दलितों की बात कही गई। दर्द तो परसों से शुरू हुआ, जब सदन में आपके आदेश से एक कॉलिंग-अटेंशन मोशन आया। सवाल है कि देश में शैक्षणिक और सामाजिक रूप से जो पिछड़े वर्ग हैं उनकी ५४ प्रतिशत आबादी है और एस.सी. तथा एस.टी. २४ प्रतिशत हैं। इस प्रकार से संविधान में जो ७८ प्रतिशत देश की आबादी, जो बैकवर्ड के नाम से जानी जाती है, उसके कल्याण का काम हो रहा है, तो उस पर क्यों विवाद खड़ा किया जा रहा है ? इसकी संविधान में परिभाषा दी गई है। संविधान की धारा १५(४) में यह स्पष्ट किया गया है कि वैसे गवर्नमेंट को, संसद को और न्यायपालिका को बेसिक फीचर्स को बदलने का अधिकार नहीं है- संविधान की धारा १५(4) में इस प्रकार है - 
“Nothing in this article or in clause (2) of article 29 shall prevent the State from making any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. ”   एडवांसमेंट का क्या मतलब हुआ ? सामाजिक और शैक्षणिक रूप से जो पिछड़े वर्ग के लोग हैं, इस देश में जो ७८ प्रतिशत हैं, उनके विकास के लिए हायर ऐजूकेशनल इंस्टीटयूट चाहे वे टैक्नीकल ऐजूकेशन के इंस्टीटयूट हैं, …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: We are not going into the detailed merits.
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : अध्यक्ष महोदय, आपकी स्वीकृति से सदन में कॉलिंग अटेंशन मोशन आया, सरकार की तरफ से एक राय आई, वह स्वीकृत हुआ। जब सदन एक मत था, पूरे संसद की एकमत से राय थी कि इस पर सेंट्रल लॉ आना चाहिए था, तो फिर यह आपत्ति क्यों ? इसीलिए एक सर्वदलीय बैठक हुई। एक माननीय सदस्य नहीं गए हों, वह अलग बात है, लेकिन हम सब लोगों ने रात्रि में ९.०० बजे तक इस विषय पर गम्भीरता से विचार-विमर्श किया। माननीय श्री अर्जुन सिंह, माननीय एच.आर.डी. मनिस्टर ने मीटिंग की अध्यक्षता की और यह एक आम सहमति बनकर आई कि सोश्यल जस्टिस को मैनटेन रखने के लिए एक सेंट्रल लॉ आना ही चाहिए। मतलब यह है कि सोश्यल जस्टिस को मैनटेन करने के लिए एक सेंट्रल लॉ आए, इतनी सहमति हुइर्[rpm25] ।
दूसरी सहमति यह हुई, जो माननीय मल्होत्रा जी राय रख रहे थे, मैं उससे सहमत नहीं हूं। आर्टीकल ३० में जो माइनोरिटी इंस्टीटयूशंस हैं…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय : नहीं-नहीं, वह छोड़िये, अभी वह बात नहीं है। You have said that you do not agree with him. ठीक है, हो गया।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : मैं कह रहा था कि यह भी राय कल हुई कि माइनोरिटी इंस्टीटयूशंस को भी प्रोटैक्शन मिले और एक सैण्ट्रल लॉ बने, जिसमें एजुकेशनली, सोशली जो बैकवर्ड क्लासेज़ हैं, इसमें भी राय हुई…( व्यवधान) 
PROF. VIJAY KUMAR MALHOTRA : We do not agree.
MR. SPEAKER: Please do not go into this.  I will request all the hon. leaders not to go beyond what has been agreed to meet this phase, because these are very debatable issues.
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : आपकी पार्टी की तरफ से आप बैठक में नहीं थे, देख लीजिए। …( व्यवधान) अध्यक्ष महोदय, यह विषय इतना गम्भीर है कि इस पर राय स्पष्ट होनी चाहिए। यह सुप्रीम कोर्ट के जरिये दुर्भाग्यपूर्ण ऑब्जर्वेशन है, क्योंकि भारतीय संविधान की जो मूल भावना है, भारतीय संविधान का जो प्रिएम्बल है, उसको खंडित करने का किसी को अधिकार नहीं है। सबसे सर्वोपरि हमारा संविधान है और आप पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी के संरक्षक हैं, कस्टोडियन हैं, चूंकि आप स्पीकर हैं। अध्यक्ष महोदय, मेरा आपसे निवेदन है कि आपका एक नियमन इस पर आना चाहिए। आम तौर पर पिछले दिनों हाल ही में जितनी टिप्पणियां न्यायपालिका से आई हैं, मैं समझता हूं कि हम लोगों को इस पर कोई टकराव नहीं करना चाहिए और यह संदेश नहीं जाना चाहिए। यह ठीक है, जो माननीय रामगोपाल जी ने कहा है, हम लोग संदेश सदन से नहीं देना चाहते हैं, लेकिन यह भी व्यवस्था चाहते हैं कि जो न्यायपालिका है, कार्यपालिका है या विधायिका है, ये अपनी-अपनी सीमा में रहें, लक्ष्मण रेखा को लांघने की कोशिश न करें, नहीं तो इस देश में नई परिस्थिति पैदा होगी और इस परिस्थिति का फिर कहीं समाधान नहीं होगा। ऐसा कोई उपयुक्त मंच नहीं है, जिससे इसका समाधान निकल सकेगा। इसके लिए सर्वोच्च सदन ही एक मंच है और संसदीय लोकतंत्र के सर्वोपरि आसन पर आप बैठे हैं और आपका नियमन हम चाहते हैं कि इस पर टकराव नहीं रहे और संतुलन बना रहे। न्यायपालिका और विधायिका में भी आने वाले दिनों में संतुलन बना रहे, इसकी गारण्टी के लिए हम आपसे भी नियमन चाहते हैं।…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय : ठीक है, हो गया।
…( व्यवधान)
MR. SPEAKER: It is enough. Now, Shri Gurudas Dasgupta.
… (Interruptions)
श्री मोहन सिंह पहले सदस्य और स्पीकर का टकराव रोका जाये।
अध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइये।
SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): Sir, the Supreme Court says … (Interruptions)
MR. SPEAKER: It is not being recorded, Shri Swain.
(Interruptions) … * MR. SPEAKER: It will not be recorded.
(Interruptions) … * MR. SPEAKER: Nothing will be recorded except Shri Gurudas Dasgupta’s submission.
(Interruptions) … * MR. SPEAKER: Please, this is not fair. We have evolved a procedure today because many hon. leaders wanted to express their views.  It was very, very seriously and pointedly done on the last occasion.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please do not do this. I appeal to you.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Otherwise, I will stop this discussion if you go beyond this procedure. After all, we are also entitled to our rights.  Let us not try to create dissension between the two.
… (Interruptions)
* Not Recorded           MR. SPEAKER: Please sit down.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: We are all conscious of our obligations. I made a request at the beginning that we have also to respond in a manner which does keep with maintaining dignity of ours and also the dignity of the Supreme Court.  The Supreme Court is the highest forum of our country so far as the judiciary is concerned.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I have said that. Please request him not to interrupt.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Kindly do not interrupt and give up this habit of interrupting.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please sit down. This is not the way to do it.  You are a senior Member now.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Nothing will be recorded except Shri Gurudas Dasgupta’s submission.
(Interruptions) … * SHRI GURUDAS DASGUPTA Mr. Speaker, Sir, we, in this House, are deeply distressed across the political line. We are deeply and grievously hurt because of some remarks that have been made. Most respectfully, I may submit that the remarks are uncalled for and it is extremely unfortunate. While responding to the judgement on reservation in private institution, there was no word of confrontation uttered in this House[mks26] .
There was no reflection at all. Let us recall the discussion. There was no reflection at all on the wisdom of the Judiciary. What was felt was that the principle of social justice has to be safeguarded and,  for that, a Bill needed to be brought forward in * Not Recorded this House for its approval.  We feel so because social justice is considered to be a fundamental foundation of the Indian Constitution.
            Let me recall that in 1969, the Bank Nationalisation Act was struck down by the Supreme Court. In 1970, the abolition of Privy Purses was also called ultra vires  of the Constitution. In 1986, the famous or infamous, whatever you may call, Shah Bano case judgement was there. On all those occasions, Parliament opted to respond to the judicial pronouncement. Kindly remember that on all those occasions, Parliament responded and we made laws. My point is that when Parliament responded on those occasions, not a word of confrontation was ever uttered by any member of the Judiciary. The Supreme Court opted to declare a particular Act as ultra vires   and Parliament responded to it by enacting a new law. There was no word of animosity.
            What is new in the situation? This situation has developed over 57 years after the adoption of the Constitution. We did our job.  The Judiciary did its job. I agree with Prof. Ram Gopal Yadav that the Judiciary has a right to take a view of the decisions of the Parliament. They have a right and they should exercise that right fearlessly because the Constitution enjoins upon them that right. Equally,  Parliament has a right to respond to the situation by making a new law. But what is the newness of that thing? Never before has such a caustic remark been made on the deliberations in Parliament. This is the new thing. Because of the new thing, because of the  utterance of animosity,  because of intolerance, because of uncalled for remarks, we feel hurt. Why do we feel hurt? We feel hurt  because Parliament must be allowed to do its job. The Judiciary must be allowed to do its job.… (Interruptions) There should not be any animosity.

प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : आपको किसने रोका है? …( व्यवधान) 
SHRI GURUDAS DASGUPTA :  There is. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: This is not right.
… (Interruptions)
SHRI GURUDAS DASGUPTA : This is an element of intolerance which we must take note of. I am only saying that never before was such a remark made by the Judiciary. This is the method of alarming. The Indian Constitution provides for the harmonious functioning of the different organs of the State. An element of animosity, element of intolerance, element of  transgression by one arm into the functioning of another will put the Indian Constitution into peril.  That is where the danger of democracy is. That is where the Constitution seems to be undermined.
            Therefore, I plead that the animosity should end. I plead that harmonious functioning should be encouraged.  Parliament  is respectful. We are respectful to the Judiciary. We expect the same from the Judiciary. That is why I plead for  sanity, constitutional sanity. I plead for constitutional propriety. I plead for the sanctity of the Indian Constitution. Thank you.
SHRI BRAJA KISHORE TRIPATHY :  Mr. Speaker, Sir, we have been very much deeply shocked by the development. The three organs of democracy should function within their jurisdiction. Whatever right and power that the Constitution has given us, we should function within our limitation[R27] .

So, we should not cross the Lakshman Rekha.  I am hundred per cent one with what you have mentioned that we should not cross the Lakshman Rekha.  This is the wisdom of this august House.  We are the representatives of the people.  The constitutional law is not static; any law is not static.  We must reflect the opinion and the aspirations of the people.  So, we have rightly adhered to this principle of social justice in the Constitution.  It is because at that time it was the need of the hour to keep the country united. If this reservation policy would not have been adhered to or accepted in the Constitution, it would have been difficult to keep the country united at that time.  So, we must look back the historical background that how the founding fathers of the Constitution have discussed it in detail.  To keep the country united, we have accepted this principle of social justice.  We cannot go away beyond the principle of social justice. 
Those who are economically, educationally and socially backward, we must give them justice.  Now it is the requirement in the private sector in higher education.  Educationally and economically backward boys and girls must be given justice.  It is the wisdom of this House.  It is the aspiration of the people of this Country. We must go ahead for legislation. We will give 100 per cent support to the Government to bring  the legislation.  Therefore, my earnest request to you is that we must see that there should not be any confrontation with Judiciary.  The judges of the Supreme Court in their wisdom have given this judgement.  There was no law at that time.  So, they have intervened as the guardian of the law of the land.  Now, the requirement of the time is that we must have some law so that the Supreme Court cannot interfere and this law will stand in the country.  Now, this is the requirement.  We must go ahead for some Constitutional amendment.  We must go for certain law.  It will help both the country and all the organs of the democracy to see that the law is completely implemented. 
...( व्यवधान)
श्री इलियास आज़मी : अध्यक्ष महोदय, हमें भी बोलने का मौका दीजिए।…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय : अभी आप बैठिए। वैसे लीडर को बुलाते हैं, लेकिन अभी आपके लीडर नहीं हैं, डिप्टी लीडर भी नहीं है, आज आप लीडर बन गए हैं, तो आपको बुलाएंगे।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमारअध्यक्ष महोदय, एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न पर आपने सभी पक्ष के माननीय सदस्यों को अपनी राय प्रकट करने का अवसर दिया, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। यह एक संवेदनशील मसला है और हम लोगों के लिए सौभाग्य की बात है कि आप सांसद हैं इसलिए स्पीकर हैं और साथ-साथ पेशे से वकील भी हैं।…( व्यवधान)   इसलिए आप दोनों क्षेत्र को ठीक ढंग से समझ सकते हैं।…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय : अभी तो सब चला गया।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : इसलिए आपने इस विषय पर सबको अपनी राय रखने का अवसर दिया।
राम गोपाल जी ने ठीक कहा और मैं उनसे सहमत हूं कि यह प्रश्न किसी भी प्रकार से न्यायपालिका या संसद के बीच टकराव का नहीं है और कोई ऐसा प्रश्न भी पैदा नहीं हुआ, ऐसी परिस्थिति भी पैदा नहीं हुई। जो कुछ भी समाचार पत्रों में आज पढ़ने को मिला, उसके हिसाब से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कोई बात कही है। सरकार के पास उनके लॉ ऑफिसर्स होते हैं, सबसे बड़े लॉ ऑफिसर मौजूद रहते हैं, वे किस प्रकार अपनी बात रख रहे हैं, यह देखना उनका काम है। संयोग से कानून मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। यह भी विलक्षण प्रतिभा के धनी कानून दा हैं। इनको भी देखना चाहिए कि आखिर कौन से निर्णय हैं जिन्हें आप महीनों लंबित रखते हैं। उसके चलते भी कभी-कभी विवादास्पद स्थिति पैदा होती है। यह अलग बात है। इसलिए सरकार को अपना पक्ष ठीक ढंग से रखना चाहिए और न्यायपालिका को अपना काम करने में सरकार को ठीक ढंग से सहयोग भी प्रदान करना चाहिए। यह देखना सरकार का काम है। मेरी समझ से संसद से किसी भी प्रकार के टकराव की बात उभरकर सामने नहीं आई।
इस विषय पर दो बातें हैं। संसद के अपने अधिकार हैं, संविधान सर्वोच्च है। न्यायपालिका को संविधान ने अधिकार दिया है और संसद के भी कुछ दायित्वऔर अधिकार हैं। कानून बनाना संसद का काम है। हमने उस दिन अपनी राय रखी थी। कल भी एक सर्वदलीय बैठक हुई थी, एक प्रश्न उभरकर सामने आया था, जिसमें सामाजिक न्याय के सिद्धान्त को अमली जामा पहनाने की बात थी[R28] ।
[r29]   सभी पक्ष के लोगों ने इस पर सहमति प्रकट की है और उसके लिए सरकार को आगे बढ़कर कानून लाना चाहिए। सरकार तो पहले हाथ खड़ा कर देती है। उसके बाद सभी दल के लोग उनको सलाह देते हैं तब उसके आधार पर सरकार आगे काम करती है, यह ठीक है। उस दिन हमने भी राय दी थी कि एक सर्वदलीय बैठक हो। वह बैठक हो गयी है और उसमें एक राय उभरकर आयी है कि उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी भी प्रकार से संसद और उच्चतम न्यायालय या न्यायपालिका के बीच टकराव की बात नहीं होनी चाहिए।
अध्यक्ष महोदय, मैं एक प्रश्न का उल्लेख यहां जरूर करना चाहूंगा। कल दलित क्रिश्चियन के मामले में वहां चर्चा हो रही थी। अध्यक्ष महोदय, हम कब तक निर्णय को टालते रहेंगे। इस देश में धर्म बदल लेने से व्यक्ति की जात नहीं बदलती। यह बापू जी ने भी कहा है। …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: We are not going into the merits of the matter.
श्री नीतीश कुमार : मैं तीन वाक्य में अपनी बात पूरी कर दूंगा, नहीं तो इसके लिए मुझे अलग से आपसे मिलकर समय मांगना पड़ेगा। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :   आप समय मांगिये।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : आपका ही समय बच गया। आज इस अवसर पर चर्चा चल रही है इसलिए मैं इस बात का उल्लेख करना चाहता हूं। यह प्रश्न ईसाइयों में भी है और मुसलमानों में भी है। हिन्दु धर्म में जो जातियां हैं, जो आज अनुसूचित जाति मानी जाती है,उसी प्रकार की जातियां मुस्लिम सम्प्रदाय में है, उनको अनुसूचित जाति की सुविधा नहीं मिलती, यह अन्यायपूर्ण है। वह हर प्रकार से शिकार होते रहे हैं। उनका पेशा एक है। इसलिए मुस्लिम समाज में इस प्रकार की जातियां हैं, इक्वलेंट जातियां हैं, …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :   क्या बात कर रहे हैं ?   आप में थोड़ी सहनशक्ति होनी चाहिए॥ ...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : यह एक ऐसा प्रश्न है …( व्यवधान)     अध्यक्ष महोदय, हमारे कुछ मित्रों को एतराज हो रहा है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका सीधा संबंध सिद्धांत से है, विचारधारा से है और मैं उस विचारधारा में विश्वास करता हूं जिसमें इनका विश्वास नहीं है। इसलिए हम खुले तौर पर कहना चाहते हैं कि मुसलमान में जो दलित जातियां हैं, उनको भी अनुसूचित जाति में शामिल करना चाहिए। यह एक प्रश्न है जिसका समाधान होना चाहिए। गांधी जी ने भी कहा है, मैं उसका उल्लेख करना चाहता हूं। …( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Nitish ji, please cooperate.
श्री नीतीश कुमार :   अध्यक्ष महोदय, कालीन के नीचे किसी चीज को डालने से काम नहीं चलेगा। मैं पुन: दोहराना चाहता हूं कि धर्म बदलने से आदमी की जात नहीं बदलती है। यह सबको मालूम है कि यहां पर किस प्रकार से मुसलमानों की ज्यादा संख्या हुई या ईसाइयों की ज्यादा हुई, यह सब धर्म परिवर्तन से हुआ। ऐसी स्थिति में उनकी बुनियादी जात बदलती नहीं है। जिस प्रकार से भी उनको झेलना पड़ता है, उसी प्रकार की उपेक्षा का शिकार वह भी होता है चाहे वह ईसाई हो या मुसलमान हो, हर जगह होता है। …( व्यवधान)   यह जो सिद्धांत है। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  आप बैठिये।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : अध्यक्ष महोदय, किसी धर्म निरपेक्ष का कनफाइन नहीं होना चाहिए। …( व्यवधान) यह आस्था का प्रश्न है। उसमें भी सरकार को आगे बढ़कर जो अनुसूचित जाति में आने लायक मुस्लिम जमात की जातियां है, उनको भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाये जाने के लिए आपको आवश्यक विधेयक लाना चाहिए और उस पर …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Mr. Swain, why are you standing? Are you the Speaker? Merely by speaking you do not become the Speaker. I have started with your party leader although he has not given any notice. Therefore, I am trying to regulate it and last time we had a very dignified response to certain matters.
            Mr. Nitish Kumar, please conclude.  आप बैठ जाइये।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : अध्यक्ष महोदय, आप जब खड़े होकर कुछ निर्देश दे रहे थे, तो उस बीच में उधर से कुछ आवाज आई कि वोट के लिए यह ऐसा कर रहे हैं। माफ करियेगा, वोट के लिए आप करते होंगे। …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Don’t take note of it? That is not being recorded.
(Interruptions) … * श्री नीतीश कुमार : यह सिद्धांत का प्रश्न है। आप लोगों को हम लोगों की पृष्भूमि के बारे में मालूम नहीं है। …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Mr. Goel, you will be in trouble one day very soon.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I am very sorry. I am hurt today. I made an appeal to everybody in pursuance of your request. I thought it was an important request and I allowed it so that a reference could be made.
… (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय :   मिस्टर मानवेन्द्र सिंह,  आपके साथ भी एक दिन ऐसा ही होगा।
...( व्यवधान)
श्री नीतीश कुमार : आप पावर में हैं तो क्यों नहीं कर लेते। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  आप छोड़िये। वह बात रिकार्ड में नहीं आया।…( व्यवधान) 
* Not Recorded MR. SPEAKER: That is not recorded.
… (Interruptions[r30] )   श्री नीतीश कुमार : अब मैं कंक्लूड कर रहा हूं। यहां से कोई टकराव का संदेश नहीं जाना चाहिए …( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: I agree with it.
… (Interruptions)
श्री नीतीश कुमार : वर्ना ऐसा एहसास होता है कि इस देश ने कई बार टकराव देखे हैं, इस देश में एमर्जेंसी लागू हुई है और इस देश में कमिटेड ज्यूडशियरी की भी बात हुई है और आज वे लोग फिर से सत्ता में हैं। कहीं फिर से इस संसद का इस्तेमाल करके,…( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Nitish Ji, you are an articulate Member. 
श्री नीतीश कुमार : इसलिए निष्पक्ष ज्यूडशियरी होनी चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय या न्यायपालिका को जो अधिकार संविधान ने दिया है, हम उसमें किसी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं।…( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: No more, please. Now, Shri Dhindsa.  Only what Shri Dhindsa says will be recorded.
(Interruptions) …* MR. SPEAKER: Dhindsa Ji, you please be brief and speak to the point. You made such a dignified speech that day. So, I request you to please be brief.
श्री सुखदेव सिंह ढींडसा सर, मैं आज भी वैसे ही करूंगा। सर, मैं संक्षेप में कहना चाहूंगा कि इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ दिन से यहां चर्चा हो रही थी कि ज्यूडशियरी और लेजिस्लेचर में कहीं टकराव न आ जाए। उसके लिए आज सभी मैम्बर्स ने कहा है कि इसमें टकराव नहीं होना चाहिए, यह हाउस की सहमति है। जहां तक कानून का सवाल है, उस पर सहमति है लेकिन मैं दो बातें कहना चाहूंगा। पहले तो मैं यह कहूंगा कि रिजर्वेशन जो हमारे पंजाब में है, जब यह रिजर्वेशन आता है तो एक तबका कहता है कि इसे ९८ प्रतिशत अधर्मी ले गये और जहां पर दूसरी जो सब-कास्ट्स हैं, जैसे कोई मजहबी है, कोई रामदासिया है या कोई दूसरा है, तो यह उनको नहीं मिलता। इसलिए मैं कहूंगा कि यह हमें स्टेट्स पर छोड़ना चाहिए क्योंकि स्टेट्स में अलग-अलग तरह की सब-कास्ट्स होती हैं जिनको पूरा इंसाफ नहीं मिलता है। इसलिए मैं एक बात कहने जा रहा हूं कि सरकार को यह सर्वे करवाना चाहिए कि रिजर्वेशन * Not Recorded जिन लोगों के लिए किया गया है, क्या उनको यह रिजर्वेशन का फायदा मिलता है कि नहीं मिलता है, यह भी हमें सर्वे करवाना चाहिए। यह फैमिलीज को नहीं है कि जो फायदा वे ले रही हैं। वे अगर सर्वे करेंगे कि जिनके लिए हमने रिजर्वेशन किया है, उसका फायदा उनको जाना चाहिए, यह सरकार को सोचना चाहिए और पार्लियामेंट को भी सोचना चाहिए।
MR. SPEAKER: Prof. Ramadass please.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Shri Ramdas Athawale, I said ‘Professor’. I do not know on which subject you can be a Professor! PROF. M. RAMADASS Hon. Speaker, Sir, our discussion in the Parliament should have only a limited purpose, and the purpose is of conveying to the Supreme Court that the Parliament has not done anything to encroach upon the powers and functions of the Judiciary. The purpose should be to tell the Supreme Court that we have not cast aspersions or any motives on the judgement delivered by the Supreme Court.  The Supreme Court in response to a number of Special Petitions has given its judgement by interpreting the Fundamental Rights guaranteed in articles 19(1)(g) and 19(6), and they were right in their interpretation.  They have told the Government that the Government should bring a comprehensive legislation.
            Now, from our point of view, as representatives of the people, we felt that the judgement was attacking the very foundation of the Indian Constitution, namely, social justice, which is of prime importance for the people’s representatives. This social justice is at stake. Therefore, we took up that for discussion. Unfortunately, there seems to be a communication gap between what we discussed and what the Judges have understood. The Judges should not have overacted on the deliberations of the Parliament. Therefore, we should convey through the Parliament, to the Supreme Court and the Judiciary that there is no confrontation.  We are doing our job, they are doing their job and everything is in the right perspective.
MR. SPEAKER: Thank you, very much. It was a dignified speech.
            Now, Shri Ilyas Azmi. I will treat you only temporarily today as leader! You should be very brief and no confrontation and provocation please[t31] .
श्री इलियास आज़मी : अध्यक्ष जी, आपने यह कैसे मान लिया कि मैं कंफ्रंटेशन करूंगा?
अध्यक्ष महोदय : आप करते नहीं हैं !  यह आपका रिकार्ड है।
श्री इलियास आज़मी :  अध्यक्ष जी, कहीं से यह नजर नहीं आता है और कोई ऐसी बात नहीं है कि विधायिका और न्यायपालिका में कोई टकराव है।यह … * MR. SPEAKER: No, that would not be recorded.
(Interruptions) … * श्री इलियास आज़मी : जबर्दस्ती टकराव की बात करना जबकि कोई टकराव नहीं है, ठीक नहीं है। हम लोग न्यायपालिका का सबसे ज्यादा एहतराम करते हैं और आज तो वे लोग भी न्यायपालिका का एहतराम करने लगे हैं जिन्होंने अपने इतिहास में न्यायपालिका का कभी भी एहतराम नहीं किया। इस तरह अब तो पूरी पार्लियामेंट न्यायपालिक पर एहतराम कर रही है।उनका जो काम है वह करे और विधायिका का जो काम है, वह संसद और विधानसभाएं करेंगी। इसमें टकराव की क्या बात है। सोशल जस्टिस देना सरकार की जिम्मेदारी है।जिन लोगों को सदियों से इंसाफ नहीं मिला है या जो अब इंसाफ पाने से पिछड़ गए हैं, जो भी सरकार आए, उन लोगों को न्याय देना उसकी जिम्मेदारी है। बार-बार यह कहना कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, पार्लियामेंट को और पूरे मुल्क को गुमराह करने की श्रेणी में आता है।
अध्यक्ष महोदय : यह क्या गुमराह-गुमराह बोल रहे हैं।
श्री इलियास आज़मी : जब शिडयुल्ड कास्ट के लिए आरक्षण से शुरूआत हुई थी, उसमेंशिडयुल्ड कास्ट के लिए हिन्दू होने की शर्त रखी गयी। बाद में सिख और बुद्धिस्ट उसमें जोड़े गए लेकिन मुसलमान और ईसाई उसमें आज तक नहीं जोड़े गए। …( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  ठीक है, आपने अपनी बात कह ली, अब बैठ जाइए।
...( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Thank you very much for your kind co-operation. Please take your seat now.
* Not Recorded श्री इलियास आज़मी : महोदय, मुझे अपनी बात तो पूरी कर लेने दीजिए।…( व्यवधान)  सारा आरक्षण ही धर्म के आधार पर शुरू हुआ है और आज तक धर्म के आधार पर चल रहा है। हिन्दू धोबी, सिख धोबी और बुद्धिस्ट धोबी आरक्षण पाता है, लेकिन मुसलमान या ईसाई धोबी आरक्षण नहीं पाता है।…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  आप इसको जानते हैं कि अभी यह प्वाइंट नहीं है। ठीक है, आपने अपना व्यु दे दिया है, अब बैठ जाइए।
श्री इलियास आज़मी : दूसरे बुनकर, मेहतर, सफाई कर्मचारी आरक्षण पाते हैं, लेकिन मुसलमान नहीं पाता है। इसीलिए यह कहना कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए, ठीक नहीं है।जब सारा धर्म के आधार है तो आगे भी धर्म के आधार पर होने में कोई दिक्कत नहीं है।…( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Nothing would be recorded.
(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदय :  आजमी जी, प्लीज को-ऑपरेट कीजिए। मेहरबानी करके बैठ जाइए।
श्री इलियास आज़मी : कृपया मुझे बोलने दीजिए। जब से खड़ा हुआ हूँ, आपने रोकना शुरू कर दिया।…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय : आप क्या बोल रहे हैं? If you again make imputation, I would not allow you to speak at all. This is your habit.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Better give up that habit.
… (Interruptions)
 श्री इलियास आज़मी : आपने दो-तीन सदस्यों वाली पार्टियों के लोगों को बोलने का ज्यादा समय दिया है। मैं २० सदस्यों की ओर से बोल रहा हूँ, इसलिए मेरी बात सुन लीजिए।
अध्यक्ष महोदय :   अब नहीं सुनुंगा। यह कोई मजाक की जगह नहीं है।
श्री इलियास आज़मी : महोदय, मैं आपकी इसी टिप्पणी के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ कि आप मेरी बात नहीं सुनेंगे।
अध्यक्ष महोदय :  ठीक है, आपने जो कहा है, वह रिकार्ड में है। It [e32] was decided that only Leaders would speak. I have allowed you to speak today but you are again raising issues which are confrontational in nature.
*Not Recorded … (Interruptions)

श्री इलियास आज़मी : यह कहना कि मुसलमानों को कुछ न मिले कंफ्रेटेशन नहीं है और अगर मैं यह कहूँ कि धर्म के आधार पर जो आरक्षण है, उसे खत्म कीजिए और आरक्षण से धर्म को निकालिए तो वह कंफ्रंटेशन है। अध्यक्ष जी, आप इंसाफ दीजिए, आप न्याय की कुर्सी पर बैठे हैं।…( व्यवधान) 
MR. SPEAKER: Hon. Members, please co-operate.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Hon. Members Shri Sushil Kumar Modi, Shri Varkala Radhakrishnan, Shri Ramdas Athawale and Dr. Manda Jagannath had given notices for raising this matter under what are called ‘raising important matters after the Question Hour’. Since we have agreed, I believe, all of their names would be associated with this discussion.
श्री सुशील कुमार मोदी (भागलपुर) : अध्यक्ष महोदय, हम लोगों ने अपने नाम दिए थे…( व्यवधान) 
अध्यक्ष महोदय :  ठीक है, बैठ जाइए। आपके लीडर बोल चुके हैं।
THE MINISTER OF DEFENCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Mr. Speaker, Sir, I have listened to the hon. Members. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: Mr. Owaisi, please co-operate.
… (Interruptions[e33] ) 13.00 hrs MR. SPEAKER: This is a very serious matter.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: I know that you are a very serious Member.   I also respect you.
… (Interruptions)
SHRI PRANAB MUKHERJEE : Sir, I have listened to the observations made by the hon. Members on a very sensitive issue.   As you have very correctly pointed out that we should restrain ourselves in making our observations, I am not going into the details.  Many comments have been made which are, to my mind, outside the purview of the scope for which you have allowed the hon. Members to speak on.
            So far as the position of the Government is concerned, I would like to make it quite clear that the independence of judiciary is the foundation of our democratic republic and rule of law.  Eversince the adoption of Constitution, the executive, legislative and the judiciary have been, by and large, functioning within the demarcated areas.    This goes to the credit of our parliamentary system.   We are proud that we have independent judiciary which has been assigned the task of interpreting the laws and the Constitution.  The Government recognises that proper respect is to be shown to the judicial pronouncements.
            We also recognise that legislature has to perform its duties to translate into action the programmes of the Government.  On occasions where the interests of the nation demand that laws should be enacted to carry froward social, economic programme, the legislature has enacted laws keeping in view the various judgements of the apex Court.   There has been no confrontation of any kind and there is no occasion to express anguish on account of any legislative action. … (Interruptions)
PROF. VIJAY KUMAR MALHOTRA : The hon. Minister of Law should say something. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: He does not want to say anything.  The Leader of the House is here.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: You are not yet the leader.  You are a leader on your own right, but not of this House.
… (Interruptions)
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY  Sir, I would like to know from the Government about their intention towards the question of making reservations for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and other Backward Classes in the private educational institutions. … (Interruptions)
MR. SPEAKER: Will you allow the Speaker to say something?   Will you allow the Chair to say something?  Thank you for your kind cooperation.  
I allowed the hon. Leaders to make some observations, not comments on the observations of the Supreme Court because hon. Members and Leaders felt that such observations may be allowed to be made here.  Therefore, a special procedure has been adopted only for today. But, as I said earlier, this is a matter which should be dealt with, with great caution.  We should not say something which may be misunderstood.
  On what has appeared in the newspapers, I only wish to say that during the last occasion, the House unanimously expressed its views. That was also a glory of this institution that when occasion arises, the House forgets about its differences and in one voice expresses its views which concern the people of the country as a whole and that what was precisely done.  All the sections of the House had expressed their views.  As I said, we are obliged to act according to the Constitution. Legislature has its own rights and Parliament, as the supreme legislative body, surely will act according to its rights under the Constitution.   Similarly, the courts have their own rights to function in their own sphere without any interference; and nobody can interfere.    Now there is undoubted right of the court to construe the laws passed by this Parliament.    Therefore, many laws passed by the Parliament have been declared ultra viresand it is binding on everybody.  Therefore, what is important is that there should be a harmonious relationship between the major constitutional organisations like the legislature and the court, and nothing should be done or said which may create an avoidable controversy.   The only thing which strikes me is that the observations which the Supreme Court kindly made yesterday were not part of any judgment[R34] . 
[krr35]              It is not in deciding a matter before the Supreme Court but it was an expression of certain views of the Supreme Court with regard to what may have happened inside the House. Therefore, we are only requesting ourselves that we should not do or say anything which may be misunderstood. But we are also not giving up our right to make laws according to the constitutional provisions which the Supreme Court will have power, no doubt, to construe at the appropriate time.
            The unanimous view of the House that a law is necessary, I hope, will be translated into action as soon as possible.
                 http://indiankanoon.org/doc/875647/

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