Monday, September 21, 2015

Kingdom's response to Makkah Incidence- How Rajiv Sharma reflects

इस शहंशाह के फैसले को सलाम.....
राजीव शर्माकोलसिया
दुर्घटना मक्का में हो या केदारनाथ में, उसमें मेरे और आप जैसे आम इन्सानों की जान जाती है। हादसा कैसा भी हो, उसमें घायलों के साथ हमदर्दी और दिवंगत हुए लोगों के प्रति सम्मान होना चाहिए। शासन का फर्ज होता है कि वह पीड़ित लोगों के साथ हमदर्दी से पेश आए।
 मक्का के धार्मिक स्थल में हुए हादसे के बाद इसकी चर्चा मीडिया, फेसबुक, ट्विटर, वाॅट्सएप और न्यूज वेबसाइट्स पर थी ... लेकिन दुख की इस घड़ी में जो किरदार मुझे सबसे ज्यादा मजबूत और इंसाफ पसंद नजर आया, वह हैं सऊदी अरब के किंग सलमान।
1- फेसबुक पर उनके बारे में काफी कुछ लिखा जा रहा है और इस बात का जिक्र है कि उन्होंने दुर्घटना में जिम्मेदार कंपनी पर जुर्माना और प्रतिबंध लगा दिया। फैसले के अनुसार, दिवंगत हुए लोगों के परिजनों को 10 लाख रियाल और 2 परिजनों को हज की सुविधा दी जाएगी। दिवंगत हुए लोगों के परिजनों को 3 लाख रियाल कंपनी देगी। अपाहिज हो चुके लोगों को 10 लाख रियाल, घायलों को 5 लाख रियाल और हज की सुविधा दी जाएगी।
2- मस्जिद का जो हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ वह 72 घंटों में बना दिया गया। मामले की सुनवाई हफ्ते भर में हो गई। न कहीं दंगा हुआ, न गोली चली, न किसी ने पत्थर फेंके, न पुतले फूंके गए और न इसकी नौबत आई। किंग सलमान ने भी दिवंगत लोगों के जनाजे को कंधा दिया।
3- ये सब बातें मैं मीडिया में आई खबरों के आधार पर लिख रहा हूं। अगर इसमें आंकड़ों की गलती हो तो मुझे बताइए, उसमें सुधार कर लूंगा लेकिन पूरे घटनाक्रम में यह बात जाहिर हो रही है कि किंग सलमान का फैसला देखकर लगता है कि सिर्फ इंसाफ ही नहीं हुआ बल्कि लोगों को महसूस भी हुआ है कि सच में इंसाफ हुआ है। इसके लिए किंग सलमान की तारीफ की जानी चाहिए।
4- आपदाएं और दुर्घटनाएं कहीं भी घटित हो सकती हैं। उन्हें रोकने के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। अगर दुर्भाग्य से ये घटित हो जाएं तो इनसे सबक लेकर इंसाफ होना चाहिए। केदारनाथ में आई आपदा भी एक भयंकर त्रासदी थी लेकिन उसमें अपनों को खोने के बाद सरकारी तंत्र का भ्रष्टाचार, कामचोरी और लापरवाही ने जख्मों पर नमक का काम किया।
5- भगवान न करे लेकिन अगर मक्का हादसे के पीड़ितों का सामना भारत के अफसरों, नेताओं और कामचोर सरकारी तंत्र से होता तो उनका दुख और ज्यादा बढ़ जाता। उनके लिए दो लाख रुपए मुआवजे का ऐलान होता। हो सकता है कि कोई नेता टीवी पर आकर ज्ञान भी बांट जाता कि लोग तो जाते ही मरने के लिए हैं।
6- जब लोग मातम से निकलकर जिंदगी जीने की कोशिश करते और सरकारी बाबुओं से मुआवजे की रकम लेने जाते तो उन्हें चक्कर पर चक्कर कटवाए जाते। कोई अफसर रिश्वत मांगता तो कोई बाबू विधवा हो चुकी औरत की अस्मत। उनके दिलों में इस बात का कोई खौफ नहीं होता कि एक दिन तुम्हें भी मौत आएगी।
7- फिर लोगाें को खबर दी जाती कि सरकार की एक कमेटी इस मामले की जांच कर रही है। इसलिए जांच पूरी होने तक यहां मत आओ। लोग अपने घरों को चले जाते। दो साल बाद पता चलता कि जांच कमेटी ने अभी काम ही शुरू नहीं किया। हालांकि उनकी खातिरदारी, मौज-मस्ती और होटलों में रुकने पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं।
8- करीब 5 साल बाद जब लोग सरकारी दफ्तरों में पहुंचकर मिन्नत करते कि भैया, मुआवजे के दो लाख दे दो ताकि बेटी की शादी में काम आ जाएं तो सरकारी बाबू बड़े बेमन से फाइल खोलता और कहता, अरे अब क्या करने आए हो? तुम्हें तो 4 साल पहले ही पूरी रकम मिल चुकी है। अब जाओ यहां से। क्यों रोज-रोज माथा खाते हो?
आखिकार वे लोग रोते-लुटते घर आ जाते और इसे ही अपनी किस्मत का फैसला समझकर हादसे को भूलने की कोशिश करते।
9- कृपया इसे कल्पना न समझें। केदारनाथ त्रासदी के बाद कई लोगों के साथ इससे भी बुरा हुआ है। मीडिया में ऐसी भी खबरें आई थीं कि जब कुदरत के कहर के बाद लोगों का सबकुछ लुट गया तो सरकारी बाबुओं ने किसी को 5 रुपए और किसी को 100 रुपए का चेक दिया, जब अनाथ हुए बच्चे भूख से रो रहे थे तब हमारे अफसर चिकन-दारू की पार्टी कर रहे थे।
इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद ये है कि दुर्घटनाओं या आपदाओं से सबक लेना चाहिए और उनसे पीड़ित लोगों को तुरंत मदद मिलनी चाहिए। इसमें बहुत देर, सरकारी बाबुओं का निठल्लापन, भ्रष्टाचार आदि सख्ती से रुकना चाहिए, क्योंकि ऐसी मुश्किलें किसी का धर्म पूछकर नहीं आतीं। जो भी अफसर या कर्मचारी पीड़ित लोगों का हक मारता है उसे सजा-ए मौत होनी चाहिए।
विशेष- केदारनाथ त्रासदी के समय हमारे जिन फौजी भाइयों, अफसरों, कर्मचारियों, नागरिकों आैर देशवासियों ने लोगाें की मदद की, उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। काबा अल्लाह का घर है आैर केदारनाथ भगवान शिव का। भारत सरकार को भी केदारनाथ त्रासदी के शिकार लोगों के साथ इन्साफ करना चाहिए।
- राजीव शर्मा, कोलसिया


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