Sunday, October 6, 2013

AAP and Muslim Minority - Doubts and Expectations

'आप और अल्पसंख्यक वर्ग 

S. Mansoor Agha with Arivind Kejrival, 

आषंकाएं और सम्भावनाएं

सैयद मंसूर आग़ा


लोकपाल बिल के लिए अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के गर्भ से जन्मी 'आम आदमी पार्टी (आप) की आयु तो दो ही साल हैं, मगर चरचा इतनी है कि दिल्ली में 4 दिसम्बर को होने वाला विधान सभा चुनाव में सत्ता पक्ष (कांग्रेस) और मूल विरोधी पक्ष (भाजपा) के बीच मुक़ाबले तीसरे पक्ष के तौर पर इसका भी स्थान होने की सम्भावना है। अनेक सीटों पर मुक़ाबला तिकोना होने के आसार है ं। नर्इ पार्टी के इस अप्रत्याषित उठान से किस का फ़ायदा होगा और किस  का  नुक़सान, यह केवल अनुमान का वि षय है। लेकिन एक बात स्पष्ट है। 'आप का हिस्सा उस ी वोट में होगा जो किसी कारण सरकार के काम काज से संतुष्ट नहीं। 'आप की अनुपसिथति में भाजपा आषा कर सकती थी यह सारा वोट उस के पक्ष में जा एगा मगर अब यह वोट बंट जाएगा। भाजपा ने हाल ही में जापानी पार्क में जो रैली की थी उसका एक उíेष्य मध्यम वर्ग में मोदी उन्माद जगा कर इस क्षति को कम करना भी था। अभी चुनाव में दो माह हैं। जंता अगर भावनाओं में बह गर्इ तो भाजपा की क्षति कम हो जाएगी और 'आप के उठाए हुए मुददों और तर्कों का जादू चल गया तो वह एक षकित बन कर उभर सकती है।
आम आदमी पार्टी अपनी छबि को धर्म-निर्पेक्ष रखने का प्रयास कर रही है । इसलिए  उसकी निगाहें सरकार सेे असंतुष्ट उस वर्ग पर भी लगी हैं जो किसी भी हालत में भाजपा के पक्ष में नहीं जा सक ता। इसी प्रयास में 23 सितम्बर को उसके उच्च नेतृत्व ने बडे ही खुले वातावरण उदर्ू के चंद पत्रकारों से बात चीत की। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह वर्ग 'आप की सेकूलर छबि को स्वीकार करने पर आमादा है और क्या 'आप उस को इतना उत्साहित कर सकेगी कि वह पोलिंग बूथ के लिए अपने घरों से निकले ं और उदासीन न रहे ? मुझे इन दोनों प्रष्नों के सकारात्मक उत्तर में षंका है। इसके अनेक कारण हैं। अन्ना के जिस आन्दोलन की बदोलत वह नेतृत्व उभरा जिसने 'आप की स्थापना की, उसको परदे के पीछे से संघ का पूरा पूरा सहयोग मिला था। भाजपा ने उसका समर्थन सामने आकर किया था। इस लिए पहली दृषिट में इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि कि पहली नज़र में भाजपा ही 'आप की नैसर्गिक सहयोगी है। षंका का दूसरा कारण यह है कि अन्ना आज भी नहीं मानते कि साम्प्रदायिकता भी देष की प्रगति में एक बड ़ी रुकावट है। अत: भाजपा से दूर रहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग का यह अंदेषा निराधार नहीं कि आम आदमी पार्टी उसके वोट से जो कामयाबी हासिल करेगी वह भी भाजपा की झोली में चली जाएगी।  षंका यह है चुनाव में यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो हंग (त्रिषंकु) ऐसेम्बली की सूरत में 'आप को भाजपा के साथ चले जाने में कोर्इ दुविधा नहीं होगी। 23 सितम्बर को एडवोकेट प्रषांत भूषण के निवास पर 'आप के नेतृत्व के साथ मुलाक़ात के दौरान जब इस लेखक ने यह प्रष्न उठाया तो श्री प्रषांत भूषण ने कहा: 'ऐसी परिसिथति में गठबंधन षतोर्ं के साथ ही होगा। अभी उनकी बात अधूरी थी कि कार्यकारिणी के दूसरे वरिष्ठ सदस्य योगेंद्र यादव ने टोका। उनका कहना था कि एसी सिथति में हम किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेंगे और इस बात को तरजीह देंगे दोबारा अवाम के दरबार मे जाया जाए।
एक दूसरे संदर्भ में 'आप के अध्यक्ष अरविंद केजरी वाल ने पार्टी के इस नज़रयें को स्पष्ट किया और ज़ोर देकर कहा कि हमारी नज़र में भाजपा और कांग्रेस में कोर्इ मौलिक अंतर नहीं। कुषासन और भ्रष्टाचार के लिए दोनों ही बराबर की जि़म्मेदार हैं। उनमें से किसी एक के साथ हाथ मिलाने का मतलब होगा कि कुषसन और भ्रष्टाचार को मिटाने का हमारा उíेष्य ही प्रास्त हो जाएगा।
हमारी इस मुलाक़ात के दौरान ओखला क्षेत्र से पार्टी के घोषित उम्मीदवार इरफानुल्लाह खान भी मौजूद थे। वापसी में मैंने उनसे पूछा कि हंग ऐसेम्बली की सूरत में यदि काग्रेस या भाजपा ने यह पेषकष की सरकार 'आप बनाए और वे बाहर रह  कर समर्थन दें तो पार्टी का क्या रुख होगा? उस समय तक षायद पार्टी ने इस प्रष्न पर मंथन नहीं किया था। यह पंकितयां लिखने से पहले मैंने इरफानुल्लाह खान से फोन पर फिर यही सवाल किया तो उनका दो टूक जवाब था, ßहम ऐसी किसी पेषकष को स्वीकार नहीं करेंगें। क्यों कि 'आप जो परिवर्तन लाना चाहत ी हैं वह एसी किसी सूरत में भी सम्भव नहीं। इसका मतलब साफ है 'आप की तरजीह यह है कि उसे दिल्ली में पूर्ण बहुत मत मिले, जिसकी सम्भावना नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनो के पास जिस तरह के साधन हैं वे 'आप के पास नहीं।
'आप निरंतर कह ती रही है कि राजनीति के गलि यारों में जो कोचड , गंध और भ्रष्टाचार है उसमें इन दोनोें दलों का बराबर का हाथ है। केजरीवाल ने साफ कहा, नाम अलग अलग हैं, चरित्र एक समान हैं।  उनकी दृषिट में कुषासन के मामले में एनडीए और यूपीए में कोर्इ अंतर नहीं।
दार्षिनिक रूप से यह बात आदर्ष लग  सकत ी है लेकिन व्यवहारिक राजनीति में कुछ समझोते करने पडते हैं। 'आप क्योंकि राष्ट्रीय दल के रूप में उभरने की महत्वांकषा पाले हुए है इस लिए उसको यह डर सता रहा है कि यदि दिल्ली में किसी दल से समझोता किया तो उसका कुप्रभाव भविष्य में अन्य राज्यों में दल की सम्भावनाओं पर पड सकता है। अभी उसने यह आंकलन नहीं किया कि यदि हंग एसेम्बली की सूरत में उसने दोबारा चुनाव कराने पर मजबूर किया तो क्या परिणाम निकलेगा? इस संदर्भ में उसे राम विलास पासवान के अनुभव का विषलेषण करना होगा।
इस मुलाक़ात में अरविंद केजरीवाल ने बेतकल्लुफ़ी के साथ बातें कीं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि देष में साम्प्रदायिक द्वेष की भावनाए बहुत गहरी है। उसकी उन्होंने एक मिसाल दी कि जब उन्होंने एक अवसर पर उदर्ू में 'आम आदमी पार्टी लिखी टोपी पहनी तो उनको अनेक संदेष मिला कि 'आप भी मुसिलम अपीज़मेंट (मुंह भरार्इ) कर रही है। उसपर उन्होंने पूछा कि जब मैंने तमिल या मराठी भाषाओं की टोपी पहनी तो किसी ने कहा कि तमिलों या मराठों की मुह भराइ क ी हैं, उदर्ू टोपी पहनते ही यह प्रष्न क्यों उठा? उनका कथन था कि लोगों ने इस तर्क को माना। और यह कि वे समझते हैं कि इस मानसिकता को बदलने की ज़रूरत है। उनका यह एहसास महत्वपूर्ण है। क्या यह उचित नहीं होगा कि इस तरह की भावनाओं से पीडित वर्ग के लोग उनके साथ मिल बैठ कर इस समस्या के सामाधान के लिए कार्य करें?
केजरीवाल के आने से पहले जब यह पूछा गया कि अल्पसंख्यकों के बारे में पार्टी की क्या नीति होगी तब श्री प्रषांत भूषण ने हिन्दुत्वावादियों का चिर  परिचित वाक्य दोहाराया: ßजसिटस फार आल, अपीज़मेंट फार ननÞं। ßसब के साथ न्याय, मुंह भरार्इ किसी की नहीं।Þ हमारी समीक्षा यह दर्षाती है कि अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति इंसाफ की हर बात पर भी 'मुंह भरार्इ का आरोप लग जाता है। यदि कहा जाए कि आतंक के आरोप में किसी निर्दोष को जान बूझ कर न फंसाया जाए और जिनको पकड लिया गया है उनको छोडा जाए तो यह भी 'मुंह भरार्इ कहलाता है। इसके विपरी यदि कहा जाए है कि हिन्दुत्वा की भ्रमित व दूषित नज़रये से प्रेरित आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही हो तो यह भी अल्प संख्यक वर्ग की मुुह भरार्इ और 'हिन्दू उत्पीडन कहलाता है। आरक्षण में धर्म के आधार पर असंवैधानिक भेद भाव को समाप्त करने की मांग भी 'मुंह भरार्इ कहलाती है। हमें नहीं मालूम कि 'आप इस 'मुंह भरार्इ को किस तरह परिभाषित करता है। लेकिन इस जवाब से इस षंका को बल मिलता है कि 'आप और संघ परिवार में किसी न किसी स्तर पर बौद्धिक व वैचारिक सामंजस्य है।
यधपि 'आप का कहना यही है कि उसकी प्राथमिकताओं में साम्प्रदायिकता का दख़ल नहीं, वह माहौल को सुधारना चाहती है, साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाना चाहती है और साथ ही प्रषासन और राजनीति से भ्रष्टाचार को मिटाना चाहती है, लेकिन अभी ज़मीनी हक़ीक़तें उस पर बहुत स्पष्ट नहीं लगतीं । उसका यह कहना कि षीला दीक्षित के षासन में पिछले 15 सालों में दिल्ली का चेहरा जिस तरह बदला है, वोटर उससे प्रभावित नहीं होंगे बलिक मंहगार्इ, आसमान को छूती बिजली की दरें और पेय जल की अप्रयाप्त आपूर्ति चुनाव में निर्णायक मुददे बनेंगे, तर्क संगत नहीं लगता।  यह सही है कि ये मु ददे आम नागरिकों के लिए कष्टदायक है मगर क्या इनके सहारे चुनाव जीता जा सकता है? जैसा कि 'आप का अनुमान है। इस प्रष्न का उत्तर हम पाठकों के विचार के लिए छोडते हैं।
अपने राजनीतिक दर्षन को असाम्प्रदायिक रखने की दावेदारी के बीच अरविंद केजरीवाल ने मुसिलम समाज के नाम एक खुला पत्र लिखा है जिसमें 9 मुदृदों का उल्लेख है  और कुछ वादे किए हैं। मु ददों के चयन और उनके समाधान के लिए जो वादे किए हैं उनमें परिवक्वता का अभाव है। उदाहरण के लिए पहला मुददा क़ानून व्यवस्था का  उठाया गया है और इ सके अंतर्गत आतंक के आरोप में बेगुनाहों की गिरफ़्तारियों का उल्लेख करके वादा किया गया है कि इसको रोका जाएगा और दोषी पुलिस अधिकारियों को दंडित किया जाएगा। यह वादा इस लिए भ्रामक है, कि दिल्ली में पुलिस राज्य सरकार के नहीं केन्द्रीय ग्रह मंत्रालय के अंतर्गत आती है। दिल्ली की मुख्यमंत्री तो एक सिपाही का तबादला तक नहीं कर सकता अफ़सरों को सज़ा कैसे दिलाएगा। लेकिन आम आदमी पार्टी इस मुíे को अपने जन आन्दोलन में षामिल कर सकती  थी जो नहीं किया। यदि अन्याय के विरुद्ध कटिबंध होकर खडी हो जो हम विष्वास दिलाते हैं कि न्याय में विषवास रखने वाले समर्थक बहुसंख्यकों में कुछ कम नहीं हैं ।
दूसरा मुददा, जिसका उल्लेख किया गया है वह अच्छी और मुफ्त षिक्षा है। वादा किया गया है कि सरकारी षिक्षा संस्थाओं के स्तर को ऊंचा उठाया जाएगा। हम यह याद दिलादें कि पिछले एक दषक में जो प्रयास हुए हैं उनसे  दिल्ल ी के सरकारी स्कूलों के स्तर में अप्रत्याषित प्रगति हुर्इ है। ज़रूरत इस बात की है कि अल्पसंख्यक वर्ग बच्चों की रूचि पढार्इ में बढ़े, उनके आस पास का वातावरण बदले। रोज़गार में उनको समान अवसर मिले। इसी लिए आरक्षण की मांग की जाती है। पिछडे वर्गों के विधार्थियों के लिए वज़ीफ़ों की जो स्कीमें सरकार ने मंजूर की हैं उनका लाभ ऐचिछत वर्ग तक पहुंचे। इन मामलों पर 'आप का ध्यान नहीं गया है।
तीसरा वादा यह किया गया है कि उदर्ू को वैकलिपक भाषा के तौर पर सभी स्कूलों में पढ़ाया जाएगा। उदर्ू को पढ़ाने, उदर्ू षिक्षक नियुक्त करने, उदर्ू को रोज़गार से जोडने के लुभावने वादेे बहुत हो चुके। 'आप का यह वादा उदर्ू प्रमियों के लिए सार्थक तभी होगा जब मूल समस्या का हल सामने होगा। उदर्ू को मौलिक मसला यह है उदर्ू केवल अल्पसंख्यक वर्ग की भाषा नहीं है बलिक हमारी सांझी धरोहर है, हमारी गंगा जमनी सभ्यता की पहिचान है। यदि उसकी यह पहिचान मिट गर्इ और उदर्ू केवल एक वर्ग की भाषा बन कर रह गर्इ तो इस से उदर्ू को उसको जायज़ स्थान नहीं मिलेगा। इस समस्या का हल बहुत ही आसान हैं। दिल्ली सरकार ने सन 2003 र्इ में उदर्ू और पंजाबी को राज्य की दूसरी सरकारी भाषा का दरजा दिया है। लेकिन दस साल गुजर जाने के बावजूद इस का कोर्इ प्रभाव नज़र नहीं आता। दिल्ली प्रषासन में उदर्ू या पंजाबी जानने वाला मुषिकल से ही मिलता है। हम नहीं चाहते कि आप सरकारी कर्मचारियों के लिए उदर्ू और पंजाबी को अनिवार्य करें, लेकिन इतना तो कर सकते हैं भरती के समय और उन्नति के अवसर राज्य की दूसरी सरकारी भाषाओं का सर्टिफिकेट रखने वालों को तरजीह दी जाए। यदि सरकार यह स्वीकार करले तो धर्म और जाति से ऊपर उठकर लोग खुद इन भाषाओं को पढेंगे। इस से उदर्ू के साथ पंजाबी भाषी समाज को भी लाभ मिलेगा।
इनके अलावा बिजली की ऊंची दरों,  पेय जल की समस्या, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सरकारी दफ्तरों में व्याप्त घूसखोरी और पुलिस की धांधलियों का भी उल्लेख किया गया है। ये सब सार्वजनिक सरोकार मुददे हैं। इनसे मुसिलम समाज भी पीडित है। अनुमान यह है कि उनकी पीडा कुछ अधिक है। नवां बिन्दु यह है कि दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड को सरकारी दलालों के चुंगल से छुडाया जाए गया। इस से अंदाज़ा होता है कि इस विषय का 'आप ने संजीदगी से नहीं लिया है और समस्या की जड तक नहीं पहुंची है।
अरविंद केजरीवाल ने इस पत्र में यह विष्वास दिलाया है कि उनकी पार्टी की स्थापना का उíेष्य धन लौलुपता नहीं समाज की सेवा है। यह तथ्य है सर्व विदित है कि वे इंकम टेक्स कमिषनर थे, और बहुत आगे तक जा सकते थे। वे अपने लाभप्रद पद कोे छोड कर राजनीति के बीहड में उतरे हैं। उनका यह साहस और भावना सराहनीय है। पत्र में प्रषांत भूषण जी का विषेष हवाला दिया गया है और कहा गया है कि उन्होंने गुजरात के अनेक पीडितों की सहायता की है। विषेषत: इषरत जहां हत्या केस का जि़क्र है। पार्टी ने मुज़फ्फरनग र मुसिलम विरोधी दंगे, इषरत जहां केस में आर्इ बी के रोल और 84 कोसी परिक्रमा के माध्यम से साम्प्रदायिक धुर्वीकरण जैसे विषयों पर अपनी चिंता को प्रेस विज्ञपतियों से जारी किया है। लेकिन इतना भर काफ़ी नहीं है।
अंतिम बात
षंका और आषंका की कोर्इ सीमा नहीं होती। हमने उल्लेख इस लिए कर दिया कि 'आप इस पर विचार करे। अनुमान यह है कि 'आप में अच्छी सोच युवक जुड रहे हैं। वे कुछ अच्छा करने का जज़्बा रखते हैं। उनसे संवाद और सम्पर्क बनाए रखने की आवष्यकता है। मुझे उदर्ू के जाने माने पत्रकार मेहफूज़ुररहमान मरहूम के उदगार याद आते हैं। 1984-85 की बात है जब कांषी राम और बहुजन समाज पार्टी का नाम नया नया आना षुरू हुआ था। मेरे एक प्रष्न के जवाब में उन्होंने कहा था, वह दिन दूर नहीं जब यह दल एक बड़ी षकित बन कर उभरेगा। मुसिलम संगठनों को चाहिए कि इस दल से सम्पर्क साधें , अन्यथा एक दिन आ एगा जब आप उसके दरवाज़े पर दस्तक देंगे और जवाब नहीं मिलेगा।
मुझे लगता है कि 'आम आदमी पार्टी ने यदि कमज़ोरी नहीं दिखार्इ, अपनी घोषित प्राथमिकताओं से विचलित नहीं हुर्इ तो आषा की जा सक ती है कि राजनीतिक व्यवस्था में मौजूदा गंध से पीडित समाज उसकी ओर लपके और वह सिथति आ सकती है  कि हमारी दस्तक का भी उत्तर न मिले। अल्पसंख्यक नेतृत्व को इस सम्भावना पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए --- समाप्त
फोनऋ 9818678677

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